चर्चा एक सफर की

चर्चा एक सफर की ,
अजय श्रीवास्तव,




बात 1967 की है,उन दिनों मध्यप्रदेश में कांग्रेस की  सरकार थी और मुख्यमंत्री थे द्वारका प्रसाद मिश्र।राजमाता विजयाराजे सिंधिया की भी गिनती कांग्रेस के मजबूत नेताओं में की जाती थी।मुख्यमंत्री डीपी मिश्र और राजमाता सिंधिया के बीच टकराव तब शुरू हुई जब युवक कांग्रेस के एक जलसे में डीपी मिश्र ने राजे-रजवाड़े को लेकर एक तीखा कटाक्ष कर दिया।उस जलसे में राजमाता सिंधिया भी उपस्थित थीं और बताते हैं कि वो इस कटाक्ष से बेहद आहत हो गई थीं।यद्यपि बाद में डीपी मिश्रा ने इस बाबत खेद भी प्रकट किया था, लेकिन तलवार म्यान से बाहर निकल चुकी थी।

उस सभा स्थल में हीं राजमाता ने प्रण कर लिया था कि किसी भी सूरत में डीपी मिश्रा की सरकार को वो सत्ता से बेदखल करेंगीं।राजमाता ने चुपचाप असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों को एकजुट करना शुरू किया।रीवा रियासत से ताल्लुक रखने वाले गोविंद नरायण सिंह जो डीपी मिश्रा के बेहद करीबी थे,राजमाता सिंधिया ने साध लिया।गोविंद नरायण सिंह को मुख्यमंत्री बनाने का भरोसा राजमाता ने दिया था।असंतुष्ट 36 कांग्रेसी विधायकों के सहयोग से डीपी मिश्रा की सरकार को गिरा दिया गया और गोविंद नरायण सिंह के नेतृत्व में संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी थी।बाद में राजमाता जनसंघ में चलीं गईं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस छोड़ना अचानक नहीं हुआ है,इसकी पटकथा तो कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद में लिखी जा चुकी थी।मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सबसे अधिक मेहनत की थी।कमलनाथ के प्रदेशाध्यक्ष होने के बावजूद सिंधिया ने पूरे प्रदेश में 110 चुनावी सभाओं को संबोधित किया था।इसके अलावा 12 बडे और सफल रोड शो भी किए थे।उनके मुकाबले प्रदेशाध्यक्ष और बुजुर्ग नेता कमलनाथ ने राज्य में 68 चुनावी सभा को संबोधित किया, मुकाबले में वो ज्योतिरादित्य के सामने कहीं नहीं ठहरते थे।ज्योतिरादित्य युवा थे और उन्होंने ये मान लिया था कि अगर सरकार बनती है तो वही मुख्यमंत्री बनेंगे।
विधानसभा चुनाव में राज्य के विभिन्न हिस्सों से चुनाव प्रचार के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया की हीं सर्वाधिक मांग थी और उन्होंने किसी को निराश भी नहीं किया।सिंधिया के कडी मेहनत और किसानों के नाराजगी से लगातार पंद्रह साल राज्य करनेवाले शिवराज सिंह चौहान का तिलिस्म टूटा और बेहद कम बहुमत के बावजूद कांग्रेस की सरकार बनने की संभावनाएं बनीं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के बेहद घनिष्ठ मित्रों में शुमार किये जाते हैं और सिंधिया को पूरी उम्मीद थी कि उन्हें हीं मुख्यमंत्री बनाया जाएगा मगर मुख्यमंत्री बने अनुभवी कमलनाथ।युवाशक्ति पर अनुभव भारी पडा था जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के बगावत का महत्वपूर्ण कारण बना।सिंधिया दिल से कभी भी कमलनाथ को मुख्यमंत्री स्वीकार नहीं कर पाए।इस तनातनी में दिग्विजय सिंह ने आग में घी डालने का काम किया।ग्वालियर और राधौगढ़ की अदावत का इतिहास पुराना है और आपको याद होगा 1993 में इसी दिग्विजय सिंह के कारण ज्योतिरादित्य के पिता दिवंगत माधवराव सिंधिया मुख्यमंत्री नहीं बन सके थे जबकि उनकी शुमार राजीव गांधी के मित्रमंडली में होती थी।ये बात न माधवराव सिंधिया भूल सके और न हीं ज्योतिरादित्य सिंधिया।जब माधवराव सिंधिया को परास्त कर दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने थे तो कहा गया था कि राधौगढ़ ने ग्वालियर से दो सौ साल पहले की हार का बदला ले लिया है।गौरतलब है कि एक युद्ध में ग्वालियर रियासत ने राधौगढ़ को हराकर अपने अधीन कर लिया था।सिंधिया ग्वालियर और दिग्विजय सिंह राधौगढ़ रियासत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

दिग्विजय सिंह के अनावश्यक हस्तक्षेप से सिंधिया मुख्यमंत्री कमलनाथ से और दूर होते गए।गुना संसदीय सीट से हार के बाद कमलनाथ-दिग्विजय की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को बिल्कुल हासिये पर ला खडा किया था।पहले सिंधिया समर्थक लोगों ने प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी ज्योतिरादित्य के लिए मांगी,जो कमलनाथ के पास था,उन्होंने देने से इंकार कर दिया।ज्योतिरादित्य सिंधिया राज्यसभा में जाना चाहते थे मगर कमलनाथ और दिग्विजय की जोडी ने आलाकमान को क्या समझाया, उन्हें वहां से भी स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया गया।अकर्मण्य कांग्रेस नेतृत्व सिंधिया के गुस्से को भांपने में नाकाम रही और उसके बाद ज्योतिरादित्य का भाजपा के नेताओं से संपर्क शुरू हो गया।भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया की ताकत और क्षमता को अच्छी तरह जानती है और वह राज्यसभा सीट और केंद्र में मंत्री पद दोनों देने के लिए तैयार हो गई है।अनिर्णय और अकर्मण्यता के कारण कांग्रेस ने एक और नगीने को खो दिया है जिसकी भरपाई उन्हें राज्य में सरकार गवांकर चुकानी पडेगी।

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