पूँजीवाद और समाज के बदलते परिदृश्य


          पूँजीवाद और समाज के बदलते परिदृश्य
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साम्प्रदायिकता की ऊपज में पूँजीवाद की अहम भूमिका है।यह नाजायज पूँजी देश को ,समाज को,संस्कृति को बाजार बना दिया है।आखिर दंगे(साम्प्रदायिक) शहर में ही क्यों होते हैं?गाँव में क्यों नहीं होते?गाँव में झगड़े होते है,जो प्रायः वैयक्तिक ही होते हैं।पर शहर में दंगे  (साम्प्रदायिक)होते हैं।इसके पीछे बढ़ते हुए पूंजी ही मूल कारण है।शहरी जनता पूँजीवादी मानसिकता की पोषक होती है।गाँव के गरीबों के बीच धर्म की दीवार नहीं होती,गाँव में मानवीयता,भाईचारा कायम रहता है।शहरी मानसिकता पूँजीवादी सभ्यता जिसे आप शैतानी सभ्यता कहे,गाँधी के अनुसार,महाजनी सभ्यता कहे प्रेमचंद के अनुसार या सभ्यतार संकट कहे रवीन्द्रनाथ के अनुसार।ये तमाम शहरी मानसिकता पूंजीवादी सभ्यता की उपज है जो हमें उपभोक्ता संस्कृति की ओर ढकेलती नज़र आ रही है।इस सभ्यता में मोहक शक्ति,आकर्षण करने की इतनी प्रबल शक्ति है की हमारे मन को बाजार के अनुसार बदल देती है।गाँव का पढ़ा लिखा,बेकार,बेरोजगार,कार्य हेतु शहर की ओर पलायन करता विगत चार-पांच दसक से दिख रहा.है।हाल के दो दसको में गाँव से शहर की ओर पलायन सुनामी स्तर पर दिख रहा है।शहर में वह अमानुषिक यातना को झेलने की त्रासद में जीवन यापन करता है।शहरों में पहले मशीनीकरण एवं औद्योगिकरण की आधुनिकता ने सामाजिक परिवेश को संकट ग्रस्त बनाया,सरकारी उदासीनता या सरकार की लापरवाही के कारण गाँव से शहर की ओर पलायन शुरु हुआ या शोध और विचार-विमर्श का विषय है।लेकिन बचीखुची मानवता को माल में बदलने का काम उदारीकरण,भूमंडलीकरण ने कर दिया।आधुनिकता का शिखर उत्तर आधुनिकता ने मानव को पशु से भी बदतर बना दिया।यहाँ आदर्श,नैतिकता,मानवता,संस्कृति,सब बेकार साबित हुए।केवल स्वार्थ,भोग,काम ही महत्वपूर्ण हुए।
शहर में बढ़ती हुई आबादी ने एक नव संस्कृति का जन्म दिया जिसे फ्लैट कल्चर कहा जाता है।एक ही आठ मंजिला मकान में रहते हुए लोग अपने अगल-बगल के लोगों को न जानते हैं,न जानना चाहते हैं,यह फ्लैट संस्कृति सामाजिक कोढ़ है।अजीब संस्कृति का निर्माण उदारीकरण ने किया है। एक ही फ्लैट से रोने की अवाजें,किसी के हँसने की आवाजे,उसी फ्लैट में देह व्यापार आदि आदि देखने को मिल रहा है।पूँजी में सबसे अधिक ताकत होती है।सारे आनैतिक धन्धे ,व्यापार भी सामाजिक प्रतिष्ठा में दबी रह जाती है।वहीं शहरी फ्लैट के पीछे या मॉल के पीछे या फलाई ओवर के नीचे या नाले के किनारे आमजनो की बस्ती में बदली संस्कृति का विकराल रुप भी दिखता है।
भूमंडलीकरण ने पूँजी और बाजार से सारे सामाजिकता और नैतिकता को पंगु बना दिया है।--कवि श्री हर्ष ने लिखा है इस नाजायज पूँजी पर---"शायद पैसों के जोर पर स्वामी नम्बर दो/कर रहा होगा प्रेम/और काला चंद ठण्डे चूल्हे लकड़ी से/पीटता होगा पत्नी को।"
आज मानवीय संवेदना मजाक में तबदील होते दिख रहा है।आजकल खैरियत पूछना मानों गाली या मजाक बन गया है।राजेश जोशी की कविता 'दादा खैरियत'में दीनहीन त्रासद दशा पर खैरियत आज लोगों की मजाक बनाने या चिढ़ाने के लिए प्रयोग होता दिख रहा है--
कहां बची है खैरियत/किसकी बची है खैरियत/चलन न हो कहने का/तो कौन कहता है/इस जमाने में/खैरियत मियां खैरियत।"

राजनीति के नेताओं की चाल चलन,पर मदन डांगा ने लिखा है--"कुत्ते मनुष्यों के पावों को चाट सकते हैं/लेकिन कुछ मनुष्य/कुर्सी के लिए तलुए भी चाट सकते हैं/और वे जो कुर्सी के तलुवे चाट सकते हैं/किसी के भी पांव चाट सकते हैं/और स्वार्थवश काट भी सकते हैं/कुत्तों की तरह।"

यह कविता राजनीति के तमाम खिलाड़ियों के असली चेहरे को उजागर करती है।कभी धर्म के ठेकेदारों के पैर सहलाते नेता दिखते.हैं,कभी धर्म के नाम पर जनता को भड़काते,कभी कुर्सी के लिए तलवे सहलाते।

डा. रनजीत सिनहा

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