आलू किसानों पर आर्थिक मार: लागत से भी कम मिल रही कीमत, पश्चिम मेदिनीपुर में किसान ने की आत्महत्या

March 18, 2026 6:17 PM

पश्चिम बंगाल के प्रमुख कृषि उत्पाद ‘आलू’ की खेती इस वर्ष किसानों के लिए वरदान के बजाय अभिशाप साबित हो रही है। भारी लागत और बाजार में गिरती कीमतों के कारण किसान कर्ज के दलदल में फंसते जा रहे हैं। इसी संकट को देखते हुए सारा बंगाल आलू किसान संग्राम कमेटी ने पश्चिम मेदिनीपुर के जिला मजिस्ट्रेट को पत्र लिखकर राज्य और केंद्र सरकार से तुरंत कदम उठाने की गुहार लगाई है।

लागत और नुकसान का गणित:-

कमेटी के अनुसार, एक बीघा (50 डेसिमल) जमीन पर आलू उगाने में बीज, खाद, कीटनाशक और बिजली मिलाकर लगभग 40,000 रुपये का खर्च आता है। वर्तमान में आलू की पैदावार प्रति बीघा 80 से 100 पैकेट (लगभग 40-50 क्विंटल) हो रही है। लेकिन बाजार में आलू की कीमत गिरकर 3 रुपये प्रति किलो से भी कम हो गई है।

इस हिसाब से एक बीघा की फसल बेचकर किसान को मात्र 12,000 से 15,000 रुपये मिल रहे हैं, जिससे उसे प्रति बीघा 25,000 से 28,000 रुपये का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कर्ज के बोझ तले दबे किसान ने की आत्महत्या:-

आर्थिक तंगी का आलम यह है कि किसान अब आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हैं। ज्ञापन में जानकारी दी गई है कि जिले के चंद्रकोना अंतर्गत बांगामति गांव के किसान राखाल आड़ी ने कर्ज के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली है। कमेटी ने इसे अत्यंत दुखद बताते हुए प्रशासन से मृतक के परिवार को सहायता देने की मांग की है।

प्रशासन और सरकार पर सवाल:-

संग्राम कमेटी का आरोप है कि केंद्र सरकार ने अभी तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू नहीं किया है। वहीं, राज्य सरकार ने ₹9.50 प्रति किलो की दर से आलू खरीदने की घोषणा तो की है, लेकिन धरातल पर खरीद केंद्र (कैंप) कहां हैं और किससे आलू खरीदा जा रहा है, इसकी कोई जानकारी किसानों को नहीं है।

प्रमुख मांगें (Demand List):

प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए कमेटी ने निम्नलिखित बिंदु रखे हैं:

1.सरकारी खरीद: प्रत्येक क्षेत्र में कैंप लगाकर सभी किसानों से 11 रुपये प्रति किलो की दर से आलू खरीदा जाए।

2.मुआवजा: आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार को तत्काल 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए।

3.ऋण माफी: संकट को देखते हुए आलू किसानों के सभी पुराने ऋण माफ किए जाएं और उन्हें खेती के लिए नए सिरे से ऋण उपलब्ध कराया जाए।

किसानों के इस आंदोलन ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और सरकार इन मांगों पर कितनी जल्दी अमल करती है।

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