






कोलकाता: दवाओं की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। घटिया गुणवत्ता पाए जाने के बाद, राज्य औषधि नियंत्रण (State Drug Control) ने 36 विशिष्ट बैच नंबर वाली दवाओं की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। यह कदम केंद्रीय औषधि नियंत्रण (Central Drug Control) से मिले निर्देशों के बाद उठाया गया है, जिसमें इन दवाओं की बिक्री रोकने और बाजार से वापस लेने का आदेश दिया गया था।


इन बीमारियों की दवाएं हैं प्रतिबंधित सूची में

प्रतिबंधित की गई 36 दवाओं की सूची में आम बीमारियों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण दवाएं शामिल हैं। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित प्रकार की दवाएं हैं:
बुखार, दर्द और सिरदर्द (जैसे पेरासिटामोल और इबुप्रोफेन)।
हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) को नियंत्रित करने वाली दवाएं।
एसिडिटी और डायरिया के इलाज की दवाएं।
विभिन्न प्रकार के संक्रमणों (Infections) को रोकने वाली दवाएं।
इसके अलावा विटामिन, कफ सिरप, और आईवी फ्लूइड (सलाइन) भी इस सूची में शामिल हैं।
विशेषज्ञों की राय: “परिणाम घातक हो सकते हैं”
चिकित्सा विशेषज्ञों ने घटिया दवाओं की उपलब्धता पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
डॉक्टर अनिंद्य विश्वास ने इन दवाओं के इस्तेमाल के खतरों से आगाह करते हुए कहा, ‘इन दवाओं का इस्तेमाल बेहद नुकसानदेह और घातक साबित हो सकता है। उदाहरण के लिए, संक्रमण (Infection) के लिए भर्ती मरीजों को अगर मानक से कम गुणवत्ता वाली (Below Par) दवाएं दी जाती हैं, तो उन्हें बहुत जल्दी ‘सेप्सिस’ (Sepsis) होने का खतरा रहता है। ऐसे में उन्हें जल्द ही आईटीयू (ITU) या वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है।’
डॉक्टर विश्वास ने दर्द निवारक दवाओं और पेरासिटामोल के दुष्प्रभावों के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि खराब गुणवत्ता वाली दर्द निवारक दवाओं से न केवल दर्द कम नहीं होगा, बल्कि लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर ये सीधे तौर पर किडनी और लीवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं। यही बात पेरासिटामोल पर भी लागू होती है; खराब गुणवत्ता वाली पेरासिटामोल लीवर को सबसे पहले और ज्यादा खराब कर सकती है, खासकर जब डॉक्टर आमतौर पर मरीजों को 4 ग्राम तक की खुराक की सलाह देते हैं।
वहीं, डॉक्टर बिप्लब चंद्र ने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘हम लगभग हर महीने देखते हैं कि दर्द निवारक, एंटीबायोटिक्स और टीकों जैसी महत्वपूर्ण दवाओं और आईवी फ्लूइड्स की गुणवत्ता बनाए नहीं रखी जा रही है। सवाल यह है कि इन दवाओं की आपूर्ति करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? इसी वजह से निम्न स्तर की दवाओं का इस्तेमाल जारी है और बाजार में इनकी बिक्री कम नहीं हो रही है।’
भरोसे का संकट और सख्त कार्रवाई की मांग
डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं की गुणवत्ता से समझौता सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है। डॉक्टर बिप्लब चंद्र ने स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा, ‘हम किस पर भरोसा करें? न मरीज, न उनके परिजन और न ही हम डॉक्टर अब सुरक्षित महसूस करते हैं; हमारे हाथ में कुछ नहीं है। राज्य सरकार को इस मामले में कड़े कदम उठाने चाहिए और दवा आपूर्ति की पूरी प्रक्रिया को सख्ती से नियंत्रित करना चाहिए।’





