






पश्चिम बंगाल की राजनीति में बयानों का दौर एक बार फिर तेज हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद अधीर रंजन चौधरी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर एक नया राजनीतिक दांव चला है। पिछले 24 घंटों के भीतर राजनीतिक समीकरणों पर चर्चा छेड़ते हुए अधीर रंजन चौधरी ने साफ किया है कि यदि ममता बनर्जी अपने विधायकों और सांसदों के साथ कांग्रेस में वापस लौटती हैं, तो वे राज्य में उनके नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। इसके साथ ही उन्होंने उपचुनावों को लेकर एक नई शर्त भी सामने रख दी है।


रेजीनगर में कांग्रेस को समर्थन की मांग

अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि नंदीग्राम उपचुनाव में जिस तरह तृणमूल कांग्रेस ने अपनी उम्मीदवार संचिता प्रधान दे का नामांकन वापस लेकर कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को खुला समर्थन दिया है, वह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन दोस्ती और सहयोग का यह रुख एकतरफा नहीं होना चाहिए। उन्होंने मांग की कि नंदीग्राम की तर्ज पर ही सत्तारूढ़ दल को रेजीनगर उपचुनाव में भी कांग्रेस उम्मीदवार को अपना पूर्ण समर्थन देना चाहिए।
’कांग्रेस ने हमेशा दिया साथ’
सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए वरिष्ठ नेता ने याद दिलाया कि ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर कांग्रेस से ही शुरू हुआ था। उन्होंने कहा कि वर्ष 2001, 2009 और 2011 जैसे कई ऐतिहासिक और नाजुक राजनीतिक मोड़ों पर कांग्रेस हमेशा उनके साथ मजबूती से खड़ी रही। आज भी जब कभी राजनीतिक सहयोग की जरूरत महसूस होती है, तो वे सोनिया गांधी और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क साधती हैं।
पुराने मतभेदों और कार्यकर्ताओं के दर्द का जिक्र
अपने बयान में अधीर चौधरी ने तृणमूल शासन के दौरान राज्य में कांग्रेस के साथ हुए व्यवहार पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि यह सच्चाई है कि बंगाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को हमलों और राजनीतिक प्रतिशोध का सामना करना पड़ा। संगठन को कमजोर करने के लिए कांग्रेस के कई जनप्रतिनिधियों का दल-बदल कराया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जमीनी कार्यकर्ताओं की भावनाओं और विचारों को किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सियासी गलियारों में चर्चा: दबाव बनाने की रणनीति?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अधीर रंजन चौधरी हमेशा से बंगाल में वाममोर्चा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के पक्षधर रहे हैं और राज्य स्तर पर तृणमूल की नीतियों के मुखर आलोचक माने जाते हैं। ऐसे में अचानक ममता बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार करने की बात कहना और साथ ही रेजीनगर में समर्थन की शर्त रखना, दरअसल तृणमूल नेतृत्व पर राजनीतिक दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।






