





राज्य के आलू बाजार में एक भयंकर असमानता की तस्वीर सामने आ रही है। किसान अपनी उत्पादन लागत निकालने में भी संघर्ष कर रहे हैं, जिससे पूरे राज्य में चिंता का माहौल है। kgp news की इस रिपोर्ट में जानिए कि कैसे एक तरफ बाजार में आलू की कीमत लगभग 12 रुपये प्रति किलो है, वहीं इसे उगाने वाले किसानों के हाथ में सिर्फ 1 रुपया ही आ रहा है। इस भारी अंतर ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर बीच के 11 रुपये किसकी जेब में जा रहे हैं?



किसानों का हिसाब क्या कहता है?

50 किलो आलू उगाने का खर्च लगभग 375 रुपये आता है।
इसे कोल्ड स्टोरेज (हिमघर) तक पहुंचाने का अतिरिक्त खर्च 75 रुपये है।
इस तरह एक बोरी का कुल खर्च लगभग 450 रुपये बैठता है।
जबकि, इसका सहायक मूल्य (Support Price) मात्र 475 रुपये तय किया गया है।
किसानों को मुनाफा कितना हो रहा है?
प्रति बोरी किसानों को मात्र 25 रुपये का मुनाफा हो रहा है।
प्रति बीघा औसत मुनाफा केवल 2000 रुपये के आसपास है।
तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद इतनी कम आय से किसानों में भारी असंतोष है।
बाजार बनाम किसान का सीधा गणित:
बाजार में बिकने का दाम: 12 रुपये प्रति किलो।
किसान को मिलने वाला दाम: 1 रुपया प्रति किलो।
सवाल यही उठ रहा है कि बाकी बचे 11 रुपयों का बंटवारा किनके बीच हो रहा है?
इस बड़े संकट के मुख्य कारण:
उत्पादन बहुत अधिक हुआ है—लगभग 1.5 करोड़ टन।
उत्पादन की तुलना में मांग काफी कम है।
कोल्ड स्टोरेज (शीतगृह) की क्षमता सीमित है।
किसानों की शिकायत है कि सरकारी स्तर पर खरीद अभी तक पूरी तरह से शुरू नहीं हो पाई है।
सरकार की प्रतिक्रिया:
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जानकारी दी है कि प्रभावित किसानों को फसल बीमा (Crop Insurance) के तहत मुआवजा दिया जाएगा। साथ ही, प्राकृतिक कारणों से फसल को हुए नुकसान का भी उल्लेख किया गया है।
जमीनी हकीकत और आगे का रास्ता:
मैदान पर हकीकत यह है कि किसानों पर कर्ज का दबाव लगातार बढ़ रहा है और अपनी उपज का सही दाम न मिलने के कारण उनमें निराशा छा रही है।
kgp news के विश्लेषण के अनुसार, आलू के भारी उत्पादन और उसके बाजार भाव के बीच का यह अंतर राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि इस समस्या का जल्द ही कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले समय में यह कृषि संकट और भी गहरा सकता है।





