🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस पर एक कठोर सच्चाई का प्रतिबिंब
आज 15 अगस्त, हमारा स्वतंत्रता दिवस है। 1947 में असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन, युवावस्था, सुख-सुविधाएँ त्यागकर जिस स्वतंत्र भारत का सपना देखा था, वह एक न्याय आधारित, समान अवसरों वाला, भ्रष्टाचार-मुक्त और ईमानदार देश था। उनका सपना था—भारत ऐसा राष्ट्र बने जहाँ हर नागरिक को कानून की समान सुरक्षा मिले, न्याय निष्पक्ष हो, और देश के संसाधन जनता के कल्याण में इस्तेमाल हों।
लेकिन 78 साल बाद हम एक अलग भारत के सामने खड़े हैं। सच्चाई यह है—
भ्रष्टाचार समाज के हर स्तर पर गहरी जड़ें जमा चुका है। छोटे से छोटे सरकारी काम से लेकर नागरिक के बुनियादी अधिकारों की गारंटी तक, रिश्वत और भाई-भतीजावाद का बोलबाला है।
कानून और न्याय व्यवस्था कई मामलों में पक्षपाती और विलंबित है। अमीर और शक्तिशाली के लिए कानून अलग, और आम आदमी के लिए अलग—यह तो स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का भारत नहीं था।
राजनीति कई बार जनसेवा की जगह व्यक्तिगत स्वार्थ, सत्ता की लड़ाई और आर्थिक लाभ कमाने का माध्यम बन गई है।
नैतिक पतन—देशभक्ति अब कई जगह केवल भाषण और नारों में रह गई है, कर्म में नहीं।
स्वतंत्रता सेनानियों ने ऐसे भारत के लिए संघर्ष नहीं किया था। वे चाहते थे—ईमानदार प्रशासन, भ्रष्टाचार-मुक्त समाज, न्यायपूर्ण व्यवस्था और जनता का सच्चा सशक्तिकरण। लेकिन आज का भारत उस आदर्श से काफी दूर चला गया है।
इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए—हम अपने स्तर से भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होंगे, नैतिकता के मार्ग पर चलेंगे और ऐसा भारत बनाएँगे जो वास्तव में स्वतंत्रता के असली अर्थ को दर्शाए। स्वतंत्रता सिर्फ शासक बदलने का नाम नहीं है, यह नागरिकों की सोच और मूल्यों के बदलाव का नाम है।