





पश्चिम बंगाल के कोलाघाट क्षेत्र में रूपनारायण नदी के किनारे रहने वाले सैकड़ों परिवारों के सामने आज पहचान और पेट पालने का संकट खड़ा हो गया है। राज्य सरकार द्वारा नदी के ड्रेजिंग (गाद निकालने) का काम शुरू किए जाने के बाद स्थानीय पारंपरिक रेत श्रमिकों (Sand Labour) के काम पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है, जिससे वे गहरे संकट में हैं।



क्या है पूरा मामला?

पश्चिम बंगाल सिंचाई विभाग ने ‘घटाल मास्टर प्लान’ के तहत रूपनारायण नदी की गहराई बढ़ाने और सफाई के लिए ‘नो कोस्ट’ पद्धति से ड्रेजिंग का काम शुरू किया है। यह ठेका एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को दिया गया है। प्रशासन ने सख्त निर्देश जारी किए हैं कि अब आधिकारिक कंपनी के अलावा कोई भी व्यक्ति नदी से रेत नहीं निकाल सकेगा।हाल ही में, नियमों के उल्लंघन के आरोप में पुलिस ने एक श्रमिक को गिरफ्तार किया और रेत निकालने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तीन नावों को जब्त कर लिया। इस सख्त कार्रवाई के बाद से स्थानीय मजदूरों में डर और चिंता का माहौल है।
पुश्तैनी काम पर लगा ग्रहण:-
कोलाघाट के माड़बेड़िया, नगुरिया, शालुका, पाइकपाड़ी और छातिंदा जैसे गांवों के लगभग 250 परिवार पिछले 100 वर्षों से अधिक समय से इस पेशे से जुड़े हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये लोग मानसून के दौरान और सूखे के मौसम में अपनी मेहनत से रेत निकालकर उसे बेचते थे। एक नाव रेत बेचकर एक मजदूर को दिन के 300 से 400 रुपये मिल जाते थे, जिससे उनके घर का चूल्हा जलता था।श्रमिकों का कहना है कि जिस तरह जंगलों पर वहां रहने वाले लोगों का अधिकार होता है, उसी तरह नदियों पर भी उनके किनारे बसने वालों का हक होना चाहिए।
नबन्ना और प्रशासन से मदद की गुहार:-
एक महीने से बेरोजगार बैठे इन श्रमिकों ने अपनी आजीविका बचाने के लिए पश्चिम बंगाल सचिवालय ‘नबन्ना’ को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने जिला प्रशासन के विभिन्न विभागों और विपक्ष के नेताओं को भी अपनी समस्या से अवगत कराया है।मजदूरों का कहना है कि वे विकास और ड्रेजिंग के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनके पारंपरिक अधिकारों को नहीं छीना जाना चाहिए। श्रमिकों ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि यदि आवश्यक हो, तो वे रेत निकालने के लिए सरकार को उचित राजस्व देने के लिए भी तैयार हैं।
प्रशासन का रुख:-
कोलाघाट के बीडीओ (BDO) अमिय कुमार चांद ने पुष्टि की है कि उन्हें श्रमिकों का आवेदन प्राप्त हुआ है। उन्होंने इस मामले को भूमि विभाग और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (ADM) को भेज दिया है, जो इस पर अंतिम निर्णय लेंगे।वर्तमान में, कोलाघाट के इन गांवों में सन्नाटा पसरा है और श्रमिक इस उम्मीद में हैं कि सरकार उनके पुश्तैनी रोजगार को बचाने के लिए कोई बीच का रास्ता निकालेगी।










