… लेकिन इस आरामदायक यात्रा पर क्या खुश हुआ जा सकता है ??

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खड़गपुर , कोरोना काल में ट्रेन या लोकल ट्रेन में यात्री ढूंढना वैसे ही है , मानो सावन का महीना खत्म होने के बाद बाबा धाम के रास्ते कोई कांवड़ियों को खोजे । तकरीबन आठ महीने ऐसे ही तो बीते । लेकिन लंबे उहापोह के बाद खड़गपुर – हावड़ा सेक्शन में लोकल ट्रेनों का परिचालन शुरू हुआ तो तीसरे ही दिन मैने लोकल से कोलकाता ( हावड़ा ) जाने का फैसला कर लिया । सुबह घर से निकलने तक मन में भारी उहापोह के साथ सवालों का बादल उमड़ रहा था । सरकार के मुताबिक कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ है …. ऐसे में ट्रेन में यदि भारी भीड़ हुई तो … क्या यात्रा तक भारी चेकिंग होगी ?? या काउंटर पर टिकट के लिए मारामारी झेलनी पड़ेगी ? लेकिन ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला । काउंटर से टिकट लिया और प्लेटफार्म पर जा पहुंचा । थोड़े इंतजार के बाद ट्रेन आई तो उसमें सवार हो गया । याद नहीं पड़ता हावड़ा रूट की ट्रेन में कभी इतने कम मुसाफिर दिखाई दिए हों । डिब्बे में मुश्किल से छह से सात मुसाफ़िर । सभी के चेहरे पर मास्क और सब के सब मोबाइल में खोए हुए । आरामदायक नजर आने के बावजूद परिस्थितियां मुझे कचोटने लगी । एक के बाद चिर परिचित स्टेशन आते रहे , लेकिन हर स्टेशन गहरे सन्नाटे में डूबा नजर आ रहा था । केवल कुछ रेलवे कर्मचारी और सुरक्षा जवान ही प्लेटफार्म पर नजर आए । रात दिन देखा जाने वाला भारी कोलाहल , रेलमपेल , यात्रियों की गहमागहमी , आपसी बतकही नदारद रही, जिन्हें देखने के हम आदी हो चुके हैं । …एई चा … चा गोरोम , लॉजेंस खान …. एई चॉप – सिंघाड़ा खाबेन … गोरोम आछे … जैसा हॉकरों का शोर बिल्कुल सुनाई नहीं दिया । ट्रेन शायद समय से कुछ पहले हावड़ा पहुंची थी , और मैं इस अप्रत्याशित आरामदायक यात्रा से हैरान था । लेकिन मन में कसक भी हुई और सवाल भी उठा कि क्या इस आरामदायक यात्रा पर सचमुच खुश हुआ जा सकता है ? रवानगी के बिल्कुल विपरीत मेरी वापसी यात्रा रही । शाम चार बजे हावड़ा से छूटने वाली मेदिनीपुर लोकल में खासी भीड़ थी । सुकून बस इस बात का था कि सामान्य दिनों में इस ट्रेन में तिल धरने की जगह भी नहीं मिलती । पूरे सफर में दो – एक विक्रेता ही दिखाई पड़े , हालांकि भिखारियों का आना – जाना लगा रहा । बल्कि जिस डिब्बे में मैं सवार था उसमें बेहद मैली कुचैली एक भिखारिन देर तक अंधेर मचाए रही । वो यात्रियों को छूती और पैसे मांगती , नाचती – गाती रही । यात्रियों का धैर्य जवाब देने लगा , लेकिन वो अपने काम में लगी रही । एक भी रेलवे कर्मचारी या सुरक्षा जवान ने इसका नोटिस नहीं लिया । निर्धारित समय पर मैं अपने शहर पहुंच गया , लेकिन मन में सवाल कई थे । क्या इस यात्रा पर खुश हुआ जा सकता है ….??

✍तारकेश कुमार ओझा

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