January 20, 2026

इंसान और चमगादड़ों की दोस्ती की अनूठी मिसाल: पश्चिम मेदिनीपुर का कुलडीहा गांव

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आज के आधुनिक युग में जहाँ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिमटते जा रहे हैं, वहीं पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले का ‘कुलडीहा’ गांव मानवता और प्रकृति के बीच अटूट रिश्ते की एक नई कहानी लिख रहा है। इस गांव के निवासियों ने हजारों चमगादड़ों को न केवल अपना लिया है, बल्कि वे उनकी सुरक्षा एक परिवार के सदस्य की तरह करते हैं।

पीढ़ियों पुराना है यह रिश्ता:

कुलडीहा गांव में चमगादड़ों और इंसानों का यह साथ कोई नया नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, यह सिलसिला कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। गांव के पुराने पेड़ों पर हजारों की संख्या में चमगादड़ बसेरा करते हैं। आमतौर पर लोग चमगादड़ों से दूर भागते हैं या उन्हें अशुभ मानते हैं, लेकिन कुलडीहा के लोग इन्हें अपने गांव का ‘रक्षक’ और ‘शुभ’ मानते हैं।

सुरक्षा का कड़ा पहरा:

गांव वालों ने इन बेजुबान पक्षियों (स्तनधारी) की सुरक्षा के लिए कड़े नियम बनाए हुए हैं। गांव का कोई भी व्यक्ति उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाता और न ही किसी बाहरी व्यक्ति को ऐसा करने देता है। यदि कभी आंधी-तूफान के कारण कोई चमगादड़ पेड़ से गिर जाता है या घायल हो जाता है, तो ग्रामीण तुरंत उसकी सेवा और उपचार में जुट जाते हैं।

बिना सरकारी मदद के संरक्षण:

हैरानी की बात यह है कि इन चमगादड़ों के संरक्षण के लिए ग्रामीणों को किसी सरकारी बजट या बाहरी मदद की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह पूरी तरह से जन-भागीदारी और पर्यावरण के प्रति उनकी जागरूकता का परिणाम है। ग्रामीणों का मानना है कि ये चमगादड़ उनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं और उनके बिना गांव सूना लगेगा।

पर्यावरण के लिए वरदान:

विशेषज्ञों का मानना है कि चमगादड़ पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे हानिकारक कीटों को खाकर फसलों की रक्षा करते हैं और बीजों के प्रसार में मदद करते हैं। कुलडीहा गांव ने यह साबित कर दिया है कि अगर इंसान चाहे, तो वह प्रकृति और वन्यजीवों के साथ सामंजस्य बिठाकर शांति से रह सकता है।

आज कुलडीहा गांव की यह पहल न केवल बंगाल बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। जहाँ एक ओर पर्यावरण संरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, वहीं इस छोटे से गांव ने इसे हकीकत में बदल कर दिखाया है।

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