






पश्चिम मेदिनीपुर के गड़बेता में छोटा आंगारिया कांड को लेकर एक बार फिर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक जनसभा के दौरान वर्ष 2001 की इस घटना का जिक्र करते हुए पुराने मामलों की दोबारा जांच कराने की चेतावनी दी। उन्होंने प्रशासन से इस मामले में आरोपी रहे तपन घोष के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए उन्हें जेल में देखने की इच्छा जाहिर की।


मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि राज्य में पहले हुई राजनीतिक हिंसा की घटनाओं को भुलाया नहीं गया है। छोटा आंगारिया के साथ-साथ नंदीग्राम और केशपुर से जुड़े पुराने मामलों की भी समीक्षा की जाएगी। उन्होंने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर इन मामलों की फाइलें दोबारा खोली जा सकती हैं। उनके इस बयान से राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।

इस बीच, माकपा नेता तपन घोष को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। छोटा आंगारिया मामले में उनका नाम पहले भी चर्चा में रहा है। इस मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में अदालत से बरी कर दिया गया। तपन घोष का पक्ष रहा है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप गलत थे और उन्हें राजनीतिक रूप से निशाना बनाया गया।
दूसरी ओर, प्रतिप चट्टोपाध्याय ने भी इस राजनीतिक विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अपने बयान में वामपंथी राजनीति और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि आगे ऐसा माहौल नहीं बनना चाहिए, जिसमें किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा को ही सही मानकर पेश किया जाए। उनके बयान के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं।
गौरतलब है कि छोटा आंगारिया की घटना वर्ष 2001 में हुई थी। उस समय एक घर में आगजनी और हिंसा की घटना सामने आई थी, जिसमें कई लोगों की मौत होने के आरोप लगे थे। इस घटना ने उस दौर की बंगाल की राजनीति को काफी प्रभावित किया था। मामले की जांच हुई और कई लोगों के नाम सामने आए, लेकिन बाद में सबूतों और गवाहों से जुड़ी परिस्थितियों के कारण आरोपी रहे कुछ लोगों को अदालत से राहत मिली।
अब एक बार फिर इस पुराने मामले को राजनीतिक मंच से उठाए जाने के बाद पश्चिम बंगाल में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुराने मामलों को दोबारा खोलने की घोषणा पर प्रशासन क्या कदम उठाता है और इस मुद्दे का राज्य की राजनीति पर कितना असर पड़ता है।






