





एक बड़े राज्य की सत्ताधारी पार्टी में इन दिनों भारी राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल रही है। हाल ही में राज्य के दो प्रमुख नगर निगमों के मेयरों के अपने पद से इस्तीफा देने के बाद, अब इस राजनीतिक संकट का असर सीधे संसद में भी देखने को मिल सकता है। आगामी मानसून सत्र से पहले पार्टी के भीतर एक बड़ी टूट की संभावना जताई जा रही है।



सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पार्टी के लगभग 13 सांसद अपने मौजूदा नेतृत्व से नाराज हैं और वे एक प्रमुख राष्ट्रीय दल के लगातार संपर्क में हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि बागी सांसदों की यह संख्या बढ़कर 20 तक पहुंच सकती है। सोमवार को होने वाली एक अहम गठबंधन बैठक से पहले यह स्थिति पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है।

दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) का पेंच:
वर्तमान में, लोकसभा में इस पार्टी के कुल 28 सांसद हैं। दल-बदल कानून के तहत अपनी संसद सदस्यता खोए बिना एक अलग गुट बनाने के लिए, बागी सांसदों को कुल संख्या के दो-तिहाई (2/3) आंकड़े की आवश्यकता होगी। इसका अर्थ है कि यदि 19 सांसद एक साथ आते हैं, तो वे बिना किसी कानूनी कार्रवाई के पार्टी को तोड़कर अपना एक अलग ब्लॉक बना सकते हैं।
हालांकि, जिस दल के साथ इन सांसदों के संपर्क में होने की बात कही जा रही है, उसके एक वरिष्ठ नेता ने हाल ही में बयान दिया है कि वे सीधे तौर पर किसी भी बागी सांसद को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करेंगे। इसके बावजूद, इतने सारे सांसदों का संपर्क में होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आने वाले दिनों में देश की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है।






