भूमंडलीकरण, बाजारवाद और हिंदी साहित्य!

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साहित्य समाज का दर्पण होता है।समाज में घटित घटनाएँ साहित्य में साकार रुप में प्रतिफलित होती हैं।आज का दौर भूमंडलीकरण का दौर है,जिसे वैश्वीकरण,विश्वायन,बाजारीकरण,उदारीकरण आदि के नाम से भी जाना जाता है। आज कविता,कहानी,उपन्यास,नाटक,आलोचना,जनसंचार माध्यमों पर बाजारवाद का व्यापक प्रभाव है।

भारत में 1991 ई.में नरसिंहा राव की सरकार ने व्यापारिक नीतियों में सुधार-परिष्कार करके भारतीय अर्थव्यवस्था को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा लायक बनाने हेतु उदारीकरण की नीति को लागू किया।इस तरह भारत में 1990 ई.के बाद घोषित रूप से भूमंडलीकरण लागू हुआ।
भूमंडलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो वित्तीय पूँजी.का निवेश उत्पादन और बाजार द्वारा राष्ट्रीय सीमा में ही नहीं राष्ट्रीय सीमा  से परे भूमंडलीय आधार पर निरंतर अपना प्रसार चाहती है।यह विश्व को ग्लोबल गाँव में बदलने की प्रक्रिया है।
यह भूमंडलीकरण विकास से अधिक विनाश ही किया है।भाषा,समाज,साहित्य,संस्कृति,का।

स्मार्ट और शार्टकट में अधिक कमाने और पाने की चाह,
ने मानव को पशु से भी बदतर तथा विवेकहीन बना दिया है।ग्लैमर की दुनिया,मिड नाईट पार्टी,पार्टनर एक्सचेंज,कॉल सेंटर,ओरल सेक्स,एम.एन.सी.का पैकेज,पेज थ्री की दुनिया।समाज से कटकर अपने में मस्त रहने की वृत्ती।व्यक्ति से वस्तु में बदल जाना आदि -आदि।

भूमंडलीकरण मूलतः नव उपनिवेशवाद है।जो व्यापार के जरिए संस्कृति,भाषा,आचार-आचरण सब पर अपना प्रभाव कायम करता हुआ,बाजार पर कब्जा करते हुए,भाषा,संस्कृति और मानवता को बाजारु बनाने का रणनीति है।इसके लिए भौगोलिक सीमाएँ बेमानी है।यह बाजार के माध्यम से दूसरे राष्ट्रों में प्रवेश करता है।वहाँ की संस्कृति को प्रभावित करता है। यह व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना को निगलने लगता है; व्यक्ति की सामूहिकता को नष्ट करके उसकी सोच को ‘स्व’ में बदल देता है।यह एक संक्रामक रोग की तरह समाज को एक व्यापारमंडी में बदल देता है।यह व्यक्ति को देश,संस्कृति तथा सभ्यता से विलग करके अपने व्यापारिक लाभ को पोषित करता है।मनुष्य को उपभोक्ता में बदला है।यह व्यक्ति के स्वतंत्र चिंतन को निगल जाता है।यह मीडिया तथा विज्ञापन के माध्यम से दिमाग को पंगु बनाकर वैचारिकता पर कब्जा करता है।यह दावा करता है कि सब कुछ बिकाऊ है,बस दाम उचित मिले।

भूमंडलीकरण की देन हैं–मॉल-संस्कृति,अपसंस्कृति,जंकफूड,फास्टफूड,पिज्जा,बर्गर,गरीबी,बेरोजगारी,भुखमरी,महगाँई,संगठित क्षेत्र से रोजगार की समाप्ति,अर्थ-व्यवस्था में व्यापक घपला,व्यक्ति का अकेलापन,आंतकवाद,निजीकरण,,संचार तंत्र,मीडिया क्रांति,ब्रांड संस्कृति ,उपभोक्तावाद, SEZ, FTZ,FPZ आदि।

भूमंडलीकरण ने साहित्य को भी उत्पाद में बदल दिया है।आज बाजार की मांग के अनुसार इसके सरोकार,वस्तु,शिल्प में भी बदलाव किये जा रहे हैं।इसमें मनोरंजन,उत्तेजना और सनसनी पैदा करने वाले तत्त्वों की घुसपैठ बढ़ी है।साहित्य का बाजार तैयार किया जा रहा है।किताबों की मार्केटिंग के लिए नयी-नयी रणनीतियाँ ईजाद की जा रही है।अब हिन्दी किताबों को कमोडिटी का दर्जा दिया जा रहा है।

 हिंदी भाषा भी इसके चपेट में आ ही गया।हिंग्लिश का चलन बहुत अधिक है।

किसान,आदिवासी,दलित सबसे अधिक इसके दुष्प्रभाव के शिकार हो रहे हैं।किसानों से जमीन छीनकर उद्योगपतियों के लिए सेज(SEZ)।आदिवासियों का विस्थापन,अंधाधुंध खनन,जंगल ,पहाड़ का गायब होना।
यह सब इस भूमंडलीकरण की देन है।

डा. रणजीत कुमार सिन्हा 

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