असर

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            असर
                      – पंकज साहा

      हमारे मोहल्ले में होलिका दहन की रात होली जलायी जाती है। मेरा एक शिक्षक मित्र होली समिति का सदस्य है। वह हर साल होली हेतु लकड़ी खरीदने के लिए चंदा माँगने आता था। मैं स्वेच्छा से जितना देता, उसी में वह संतुष्ट हो जाता था, पर होली-स्थल पर उपस्थित होने के लिए आग्रह करना नहीं भूलता था। मैं चंदा तो दे देता था, पर कभी होली देखने जाता नहीं था। गत वर्ष जब वह चंदा लेने आया, तब पहली बार पाँच सौ रुपये की माँग की। मैंने पूछा, “इसबार कुछ खास आयोजन है क्या?”
            वह बोला, “हाँ, यह साल हमारी होली समिति का पचासवाँ साल है, सो समिति की ओर से निर्णय लिया गया है कि इस वर्ष पचास टन लकड़ी जलायी जायेगी। तुम आना जरूर।”
          उत्सुकतावश मैं होलिका दहन की रात होली-स्थल पर पहुँचा। चारों ओर से फ्लैटों एवं मकानों से घिरे बच्चों के खेलने के मैदान के बीचों-बीच लकड़ियों के विशालकाय ढेर में आग लगायी जा चुकी थी। आग की लफटें आसमान को छू रही थीं। चारों ओर धुआँ फैला हुआ था। वहाँ बहुत लोग जुटे थे। कुछ बच्चे भी थे। कुछ लोग हाथ जोड़े लकड़ियों के ढेर के चारों ओर परिक्रमा कर रहे थे। एक कोने में ढोल, झाँझ, मजीरे के साथ कुछ लोग झूम-झूमकर होली के गीत गा रहे थे। जलती हुई कुछ लकड़ियाँ भट-भुट की आवाज के साथ फट पड़तीं और उसकी चिनगारियाँ आस-पास फैल जातीं। सब खुश होते। बच्चे तो उछल-उछलकर तालियाँ बजाने लगते। धुएँ के कारण मेरा दम घुटने लगा था। मैं तुरंत वहाँ से भाग आया। 
          होली के बाद उस मित्र से उसके घर पर मिला। जब मैंने बताया कि इसबार होली देखने गया था, तो वह बहुत खुश हुआ। मैंने पूछा, “हर साल अमूमन कितनी लकड़ियाँ जलायी जाती हैं?”
        उसने उत्साहित होकर कहा, “यही कोई बीस-बाईस टन। सिर्फ इसी बार पचास टन लकड़ियाँ जलायी गयी थींं।”
         मैने पूछा, “आत्मतुष्टि के अतिरिक्त और क्या मिलता है इससे?”
         वह आश्चर्यचकित नेत्रों  से मुझे देखने लगा। मैंने कहा, “परंपरा के निर्वाह के लिए प्रतीकात्मक रूप से थोड़ी-सी लकड़ी जलायी जा सकती है। इतनी सारी लकड़ियाँ जलाने से खामख्वाह पैसों की बरबादी होती है, पर्यावरण-प्रदूषण बढ़ता है। धुएँ के कारण कुछ लोगों को साँस की बीमारी हो सकती है और लकड़ियों से निकलने वाली चिनगारियों से कोई दुर्घटना भी घट सकती है। तुम शिक्षक हो। तुम खुद सोचो क्या मैं गलत कह रहा हूँ?”
          उसने कहा, “कह तो तुम ठीक रहे हो, पर मैं कर भी क्या सकता हूँ?”
           “तुम उस समिति में हो। यह बात वहाँ रख सकते हो।”
           ” ठीक है, रखूँगा, पर  मुझे नहीं लगता है कि कोई असर पड़ेगा।”
          परंतु असर पड़ा और जोरदार असर पड़ा। इस वर्ष होली का चंदा माँगने वह नहीं आया।

                     ——-*——

                                       डा. पंकज साहा
       एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग,
       खड़गपुर कॉलेज, खड़गपुर-721305(प. बं.)
        मोबाइल सं-9434894190
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