भारत-रूस तेल व्यापार में भारत का संतुलित रुख
भारत पश्चिमी दबावों के बावजूद रूस से तेल का आयात जारी रखे हुए है, यह कदम देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जा रहे टैरिफ और आर्थिक दबावों के बीच, भारत ने एक विवेकपूर्ण नीति अपनाई है।
आयात में इजाफा और कीमत की भूमिका:
सितंबर 2025 में भारत ने रूस से लगभग €2.9 अरब मूल्य का तेल आयात किया। यह अगस्त 2025 के स्तर के करीब है, और भारत के लिए यह संकेत है कि वह अपने ऊर्जा स्रोतों को विविधता देने की बजाय रूस से भरोसा बनाए रखना चाहता है। रूस द्वारा दिया जाने वाला “छूट” (discount) भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण है, जिससे तेल की कुल लागत कम होती है।
अमेरिकी टैरिफ और भारत की प्रतिक्रिया:
पिछले कुछ महीनों में, अमेरिका ने भारत पर 50% टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जो हिस्से में इसके रूस से तेल आयातों के कारण है। इस टैरिफ का मकसद भारत और अन्य आयात-देशों को यह संकेत देना है कि रूस से तेल खरीदना युद्धग्रस्त रूस के वित्तीय संसाधनों को मजबूत करने जैसा माना जा रहा है।
भारत ने इस टैरिफ को “अनुचित, असंगत और एकतरफा” बताते हुए अस्वीकार किया है। विदेश मंत्रालय ने यह कहा है कि भारत की आयात नीति बाजार की परिस्थितियों और घरेलू ऊर्जा जरूरतों पर आधारित है। विदेश मंत्रालय ने यह भी इंगित किया कि कई पश्चिमी देशों, जिनमें यूरोपीय संघ के सदस्य देश शामिल हैं, अभी भी रूस से ऊर्जा या अन्य अस्थायी माल ले रहे हैं।
भारत की रणनीति: संतुलित नीति और विविधता की ओर कदम
भारत की वर्तमान नीति निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर आधारित है:
1. ऊर्जा सुरक्षा:
देश की तेल आवश्यकता बेहद बड़ी है और पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं (बड़े हिस्से में मध्य पूर्व तथा अन्य देशों से) की आपूर्ति पर दबाव है। रूस से सस्ता तेल मिलने से भारत को घरेलू दुष्कर परिस्थियों में ऊर्जा की लागत को नियंत्रण में रखने का अवसर मिलता है।
2. मूल्य-छूट (Discount) का लाभ:
रूसी क्रूड तेल पर मिलने वाले डिस्काउंट ने भारत के रिफाइनरियों के लिए तेल की लागत कम की है, जिससे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को कुछ हद तक नियंत्रण में रखा जा सकता है।
3. कूटनीतिक संतुलन:
भारत पश्चिमी दबावों को नजरअंदाज करते हुए पूरी तरह तो नहीं बल्कि एक संतुलित नीति अपना रहा है। वह सार्वजनिक रूप से यह बता रहा है कि घरेलू आयात निर्णय “राष्ट्रीय हितों, उपभोक्ताओं की जरूरतों और बाजार की सच्चाइयों” पर आधारित हैं।
4. विविध स्रोत तलाश:
जहाँ संभव हो, भारत ने तेल आपूर्तियों के लिए अन्य देशों पर निर्भरता बढ़ाने की कोशिश की है, ताकि रूस पर अत्यधिक निर्भरता को कम किया जा सके। यह नीति विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण है जब रूस पर दबाव बढ़े, या रूस के तेल निर्यात में व्यवधान हो।
संभावित प्रभाव और चुनौतियाँ:
निर्यात सेक्टर पर प्रभाव: अमेरिका के टैरिफों से भारत के कुछ निर्यात प्रभावित हो सकते हैं, विशेषकर वे उत्पाद जो अमेरिका की मार्केट पर निर्भर हैं या उन उत्पादों पर जो टैरिफें झेल रहे हैं।
मूल्य अस्थिरता: अगर रूस की आपूर्ति या कीमतों में अचानक बदलाव हो, तो तेल की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिसका असर पेट्रोल-डीजल और औद्योगिक लागतों पर पड़ेगा।
वैश्विक प्रतीकात्मक दवाब: भारत को नीति-निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार भागीदारों से राजनीतिक दबाव झेलना पड़ रहा है, जो समय-समय पर भारत के विदेश नीति संतुलन को चुनौती देते हैं।
निष्कर्ष:
भारत ने दिखाया है कि वह न केवल आर्थिक और ऊर्जा-हितों को मापकर कदम उठा रहा है, बल्कि कूटनीतिक दबावों को भी ध्यान में रखते हुए अपनी नीति तय कर रहा है। रूस से तेल आयात को बढ़ाता जाना, अमेरिकी टैरिफों के बावजूद, भारत की “ऊर्जा सुरक्षा प्राथमिकता” को रेखांकित करता है। साथ ही, यह बताता है कि भारत वैश्विक दबावों में फँसने के बजाय, अपने हितों को महत्व देता है।