






नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे आने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। दिग्गज वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने चुनाव परिणामों और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला है। सिब्बल ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस चुनाव में मुकाबला राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि ‘तृणमूल बनाम चुनाव आयोग’ के बीच था।



”जहां वोट डिलीट हुए, वहां बीजेपी जीती”


कपिल सिब्बल ने एक सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि जिन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतदाता सूची से नाम हटाए (डिलीट) गए थे, उन्हीं क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को बढ़त मिली है। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए चुनाव याचिका (Election Petition) दायर करने की बात कही है।
चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका पर हमला
वरिष्ठ वकील ने सुरक्षा व्यवस्था और आयोग की निष्पक्षता को कटघरे में खड़ा करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे:
सुरक्षा का सवाल: सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सुरक्षा सुनिश्चित करना था, लेकिन राज्य भर में हिंसा की घटनाएं हुईं। उन्होंने सवाल किया कि जब भारी संख्या में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) तैनात थे, तब हिंसा रोकने में वे कितने सफल रहे?
सीसीटीवी फुटेज की मांग: उन्होंने मांग की है कि मतगणना केंद्रों पर यदि कोई हिंसा हुई है, तो चुनाव आयोग को उसके वीडियो सार्वजनिक करने चाहिए। नियमों के अनुसार, आयोग को 45 दिनों तक वीडियो सुरक्षित रखना अनिवार्य है।
पारदर्शिता की कमी: सिब्बल का आरोप है कि राउंड-वार मतगणना का डेटा सही तरीके से साझा नहीं किया गया और काउंटिंग सेंटरों पर केंद्र सरकार के कर्मचारियों का पूर्ण नियंत्रण था।
सांप्रदायिक राजनीति और कानूनी कार्रवाई
कपिल सिब्बल ने चुनाव प्रचार के दौरान हुए “सांप्रदायिक विमर्श” पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा:
”चुनाव के दौरान हिंदुओं को एकजुट होने और सांप्रदायिक आधार पर वोट देने की अपील की गई, जो कि ‘जनप्रतिनिधित्व कानून’ (Representation of the People Act) का सीधा उल्लंघन है। इसके खिलाफ कानूनी आधार पर याचिका दायर की जानी चाहिए।”
केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता पर कटाक्ष
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से ठीक पहले मार्च और अप्रैल के महीनों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने लगभग 20 ऑपरेशन किए। आई-पैक (I-PAC) के काम को रोका गया और तृणमूल नेताओं के ठिकानों पर छापेमारी और समन भेजकर दबाव बनाने की कोशिश की गई।
सिब्बल ने अंत में प्रधानमंत्री के ‘बदला नहीं, बदलाव’ वाले बयान पर तंज कसते हुए कहा कि जिस तरह से चुनी हुई सरकारों को प्रभावित किया जा रहा है, क्या यही ‘बदलाव की राजनीति’ है? उनका मानना है कि इस तरह की कार्यशैली से लोकतंत्र और संविधान की हार हो रही है।










